मैं कुछ दिनों से जब भी अख़बार पढ़ती हूँ और फेसबुक खोलती हूँ तो बस, डेरा सच्चा सौदा के अनुयायियों की तस्वीरें और खबरें ही पढ़ने को मिल रही हैं। उनकी तस्वीरों से यह लग रहा है जैसे डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी एक बहुत बड़े अरसे के बाद फिर से ज़ोर शोर से वापिस लौटे हैं, जैसा कि हम आज से दो साल पहले देखा करते थे। बाबा राम रहीम के जेल जाने के बाद ऐसी तस्वीरें पहली बार देखने को मिल रही हैं। सुनने में आया है कि इतनी भारी संख्या में इकट्ठे होकर नामचर्चा और मानवता भलाई के कार्य करके यह लोग डेरा सच्चा सौदा का ‘स्थापना दिवस’ और ‘जाम-ए-इन्सां गुरु का’ दिवस मना रहे हैं।
वैसे एक बात मैं आप सब से पूछना चाहूंगी कि जो 2 सालों में मीडिया ने डेरा सच्चा सौदा के बारे में दिखाया क्या वो सच था?
क्योंकि आज इनके अनुयायियों का विश्वास देखकर तो नहीं लगता कि जो भी मीडिया ने दिखाया है वो सच होगा। तो क्या ये आज भी करोड़ों की तादाद में बाबा को मानते हैं? ऐसे अनेक सवाल हर किसी न किसी के मन में ज़रूर आते होंगे, तो चलिए देखते हैं कि क्या डेरा सच्चा सौदा कि गतिविधियों में कोई कमी आयी? क्या टूट गए डेरा प्रेमी?
सुनने में आया है कि डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी अप्रैल का महीना फाऊंडेशन मंथ (स्थापना माह) के रूप में मनाते हैं। 29 अप्रैल 1948 को डेरा सच्चा सौदा की नींव रखी गई थी। वैसे तो हर साल इस दिन डेरा सच्चा सौदा आश्रम में भंडारा मनाया जाता था। पर बाबा राम रहीम के जेल जाने के बाद यहां कोई भंडारा नहीं मनाया गया। पर इस बार, इसी माह, डेरा सच्चा सौदा के अनुयायियों ने देश के हर कोने में जिला स्तर पर नामचर्चा करके यह महीना मनाया है। यही नहीं, इस महीने में हर ज़िले, ब्लॉक व लोकल जगहों पर अनुयायियों द्वारा गरीब बच्चों की शिक्षा हेतु कॉपियां, किताबें, ड्रेस, पेन, पेंसिल व स्टेशनरी का अन्य सामान भी बांटा गया। गरीब परिवारों को राशन, गरीब घर की बेटियों कि शादी में सहायता करना व रक्तदान जैसे कार्य भी इस स्थापना माह में बढ़ चढ़ कर किए गए हैं।

अख़बारों और फेसबुक की तस्वीरों को देख कर लगता है जैसे नामचर्चाओं में जनता की बाढ़ आ गई हो। समुन्दर कि लहरों कि तरह दूर दराज़ से लोग उमड़े और एक अरसे के बाद इन ब्लॉकों की सड़कों पर कई कई किलोमीटर तक लगे जाम देखने को मिले। रेलगाड़ियों, बसों में वही भीड़ देखने को मिली जो आज से 2 साल पहले हुआ करती थी और लोग बातें किया करते थे कि लगता है आज फिर डेरा सिरसा में सत्संग है। मगर आज की नामचर्चाओं के इकट्ठ ने सभी को हैरत में डाल दिया लोग यह देखकर दातों तले अंगुली दबा रहे हैं।

जैसा कि अखबारों की सुर्खियों में हम रोज़ाना पढ़ते हैं कि डेरा सिरसा की संगत अब टूट चुकी है मगर यह सब तो झूठ साबित हो गया। इन नामचर्चाओं में डेरा के अनुयायियों की संख्या देखकर तो नहीं लगता कि बाबा राम रहीम पर से उनका विश्वास ज़रा भी हिला है। जैसा विडिओ में हमनें देखा है कि लोग ढोल बजाते हुए नाच नाच के नामचर्चाओं में खुशी-खुशी आ रहे हैं इससे तो लगता है कि डेरा के अनुयायी आज भी टस से मस नहीं हुए, उनका विश्वास ज्यों का त्यों बना हुआ है।
हम सभी को पता है कि डेरा सच्चा सौदा एक ऐसी संस्था है जिसके अनुयायी देश व विदेश में करोड़ों की संख्या में हैं। यहां के अनुयायी हर कार्य एकता में रह कर करते हैं, चाहे वो मानवता भलाई के कार्य हो या देश की सरकार चुननी हो। जैसा कि हम सभी को पता है कि अब भी 2019 में लोकतंत्र चुनाव चल रहे हैं। तो अब भी तसवीरों में देखने को मिला कि अलग अलग राजनीतिक पार्टियां डेरा के अनुयायियों से वोट मांगने के लिए लगातार आ रही हैं। हर कोई बहुमत हासिल करने के लिए डेरा के अनुयायियों का साथ चाहता है। एक बार फिर सवाल उठता है यहां पर, कि अगर डेरा सच्चा सौदा पर लगे इलज़ाम सही थे, तो आखिर क्यों इन पार्टियों को डेरे के साथ कि ज़रुरत है? कहीं न कहीं हर आम इंसान और हर राजनीतिक पार्टी यह जानती है कि डेरे के खिलाफ बहुत गहरी साज़िश रची गयी थी।
अंत में मैं यही कह सकती हूँ कि इन सब गतिविधियों से यही पता चलता है कि डेरा सच्चा सौदा के अनुयायियों की एकता और विश्वास अब भी बरकरार है, इनको कोई नहीं हिला सकता चाहे मीडिया हो या अख़बार की झूठी खबरें। इनके जोश और जज़्बे की दाद देती हूँ और सलाम करती हूँ इनके द्वारा किये जा रहे मानवता भलाई के कार्यों को, जो आज भी सैकड़ों ज़रूरतमंदो कि मदद कर रहे हैं।



याद-ए-मुर्शिद पोलियो एवं विकलांगता निवारण शिविर एक ऐसा कैंप है जिसमें अपाहिज मरीजों का बिल्कुल मुफ्त इलाज किया जाता है। यह कैंप बेपरवाह मस्ताना जी महाराज की पावन याद में लगाया जाता है जिन्होंने डेरा सच्चा सौदा की नींव रखी थी।
यह कैंप सबसे पहले 18 अप्रैल 2008 में लगाया गया था। कल मैं डेरा सच्चा सौदा का इतिहास पढ़ रही थी जिसमें मुझे पता चला कि 18 अप्रैल 1960 को डेरा सच्चा सौदा की पहली पातशाही बेपरवाह मस्ताना जी महाराज ज्योति ज्योत समा गऐ थे। 2008 में डेरा सच्चा सौदा के मौजूदा गद्दीनशीन बाबा राम रहीम की दिशा निर्देश में ही इस कैंप का आयोजन किया गया था। उनकी याद में अब तक 10 कैंप लग चुके हैं। एक दिन पहले ही मरीजों की पर्चियां कटनी शुरू हो जाती हैं। यह कैंप 18-21अप्रैल तक चलता है। अब 18 अप्रैल 2019 में 11वां कैंप लगाया जाएगा।
यह शिविर शाह सतनाम जी स्पेशलिटी हॉस्पिटल में लगता है तथा अनेक स्टेटों, शहरों व गाँवों से यहाँ मरीज़ आते हैं। मैंने पिछले लग चुके 10 परमार्थी कैंपों का डाटा पढ़ा, जिससे पता चला कि इस दौरान भारत के जाने माने हड्डियों के विशेषज्ञ डाक्टर, जैसे कि पंजाब, हरियाणा, दिल्ली आदि से ओरथोपैडिक के सपैशलिस्ट डॉक्टर यहां अपनी सेवाएं देते हैं।
इस कैंप के दौरान मरीजों की जांच, उनका इलाज व उनके ऑपरेशन भी मुफ्त में किये जाते हैं, यही नहीं उनको दवा व ज़रुरत की वस्तुएं, जैसे कि कैलिपर इत्यादि भी मुफ्त में दी जाती हैं। यहां डेरा सच्चा सौदा के सेवादारों द्वारा मरीजों की संभाल भी अच्छे ढंग से की जाती है। मरीजों को व्हील चेयर तक भी मुफ्त प्रदान की जाती हैं।

पिछले 10 सालों में इस कैंप का फायदा हज़ारों मरीजों ने उठाया है।
इस साल भी 18 अप्रैल 2019 को यह शिविर लगने जा रहा है, तो आप भी इस निःशुल्क शिविर का फायदा उठाएं। अपने आस पास के विकलांग मरीज़ों को शाह सतनाम जी स्पेशलिटी हास्पिटल में ले कर जाइये, और इस कैंप का फायदा उठाईऐ।
दिनांक : 18 अप्रैल 2019, दिन : वीरवार
जगह : शाह सतनाम जी स्पेशलिटी हॉस्पिटल, सिरसा
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें: 01666 -260222 और 9728860222
आजकल हमारे घरों में अधिकतर बर्तन एल्युमिनियम से बने होते हैं। पूरी दुनिया की बात करें तो वर्ल्ड के लगभग 60 फीसदी बर्तन एल्युमिनियम से बनाए जाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि एक तो यह दूसरी धातुओं के मुकाबले सस्ते और टिकाऊ होते हैं, साथ ही ऊष्मा के अच्छे सुचालक होते हैं।
इनसें होने वाले दुष्प्रभाव:-
एल्युमिनियम के बर्तन भले ही सस्ते पड़ते हों, लेकिन हमारी सेहत पर इनका बहुत दुष्प्रभाव पड़ता है। इन बर्तनों में पके हुए खाने के सेवन से एक औसतन मनुष्य की बॉडी में प्रतिदिन 4 से 5 मिलीग्राम एल्युमिनियम चला जाता है। मानव शरीर इतने एल्युमिनियम को शरीर से बाहर करने में समर्थ नहीं होता है। ध्यान से देखने पर हम पाएंगे कि एल्युमिनियम के बर्तनों में बने भोजन का रंग कुछ बदल जाता है।

इनसे होने वाली बीमारी:-
स्वास्थ्य पर इसका बुरा प्रभाव इसलिए पड़ता है क्योंकि एल्युमिनियम खाने के साथ रिएक्शन करता है, विशेष रूप से एसिडिक पदार्थों से जैसे टमाटर आदि। रिएक्शन कर यह एल्युमिनियम हमारे शरीर में पहुँच जाता है। सालों तक यदि हम एल्युमिनियम में पका खाना खाते रहते तो यह हमारे मासपेशियों, हड्डियों में जमा हो जाता है जिसके कारण कई गंभीर बीमारियां घर कर जाती हैं।
इसलिए हमेशा लोहे व मिट्टी के पात्रों में ही भोजन पकाया जाना चाहिए। यह आपके भोजन के स्वाद और आपकी सेहत दोनों के लिए अच्छा है। और भी कईं बीमारियाँ हैं जो इनसें होती हैं- जैसे – कमजोर याददाश्त और डिप्रेशन, मुँह के छाले, दमा, आंखों की समस्याएं, किडनी का फ़ेल होना आदि।
मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाने और खाने के है बहुमूल्य फायदे जानिए:-
अगर आप मिट्टी के तवे पर बनी रोटी खाते हैं तो इससे आपकी गैस की समस्या दूर हो जाएगी। और इनमें बनने वाला खाना स्वादिष्ट और पौष्टिक भी होता है।
डेरा सच्चा सौदा के संत डॉ गुरमीत राम रहीम सिंह जी इंसान ने भी इसके लिए स्वास्थ्यजागरूकता अभियान शुरू किया हुआ है। इसका मुख्य उद्देश्य:-
नॉन स्टिक और एल्युमिनियम के बर्तनों के उपयोग से लोगों को बचाना और इसके बारे में शिक्षित करना ताकि इनके इस्तेमाल से होने वाली बीमारियों से बचा जा सके। गुरु जी के एक आह्वान पर साध – संगत ने नॉन स्टिक और एल्युमिनियम के बर्तनों का उपयोग करना बिल्कुल ही ख़त्म कर दिया है। उनकी जगह अब वे स्टील के बर्तन उपयोग करते हैं। गुरु जी बताते हैं कि धीमा जहर है ये एल्युमिनियम और नॉनस्टिक। जो शरीर को बीमारियों का घर बना देता है। इनके प्रयोग से हमें बचना चाहिए।

अंत में मैं यही कहना चाहती हूं कि हमें वो चीजें उपयोग करनी ही नहीं चाहिए जो हमारे शरीर को बीमारी का घर बनाए। इसलिए आप एल्युमिनियम और नॉनस्टिक के बर्तनों को त्याग कर इनकी जगह मिट्टी और स्टील से बने बर्तनों को ही उपयोग करें और दूसरों को भी जागरूक करें।

डेरा सच्चा सौदा एक रूहानी कालेज है। यहां पर इन्सानियत का सच्चा पाठ पढ़ाया जाता है। डेरा सच्चा सौदा 1948 में शुरू हुआ था। शहंशाह मस्ताना जी नाम के एक धार्मिक गुरू ने एक झोपड़ी से आध्यात्मिक कार्यक्रमों और सत्संगों का आयोजन करके इसकी शुरुआत की थी। समय के साथ साथ डेरा सच्चा सौदा के अनुयायियों की संख्या बढ़ती गई। शाह मस्ताना जी महाराज के बाद डेरा के प्रमुख शाह सतनाम जी महाराज बने। 1990 में उन्होंने अपने अनुयायी संत गुरमीत सिंह को गुरगद्दी सौंपी। हरियाणा के सिरसा जिला में डेरा सच्चा सौदा का आश्रम 70 सालों से चल रहा है और इसका साम्राज्य अमेरिका, कनाडा और इंग्लैंड से लेकर ऑस्ट्रेलिया और यूएई तक फैला है। इस संगठन के अनुयायियों में सिख धर्म के लोग, हिंदू धर्म के अनुयायी, इसाई, मुसलमान और पिछड़े और दलित वर्गों के सभी लोग शामिल हैं। डेरा सच्चा सौदा सर्वधर्म संगम के लिए जाना जाता है।
आज हम बात करते हैं डेरा सच्चा सौदा की दूसरी पातशाही शाह सतनाम सिंह जी महाराज के बारे में, जिनको 28 फरवरी 1960 को मस्ताना जी के द्वारा गुरु गद्दी सौंपी गई थी। इस दिन को इनके अनुयायी महारहमोकर्म दिवस के रूप में मनाते हैं। आइए जानें आज उनकी जीवनी के बारे में।
शाह सतनाम सिंह जी का जन्म 25 जनवरी 1919 में उनके ननिहाल में हुआ। इनका बचपन में नाम सरदार हरबंस सिंह था। इनकी माता जी का नाम आस कौर जी और पिता जी का नाम सरदार वरियाम सिंह जी था। वे जलालआणा साहिब गांव के रहने वाले थे। इन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा अपने गांव जलालआणा साहिब में ही प्राप्त की। इसके आगे मैट्रिक तक की पढ़ाई कालांवाली मण्डी में की। आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिऐ उन्होंने बठिंडा में दाखिला ले लिया, मगर अपनी माता जी का दिल न लगने की वजह से वो पढ़ाई बीच में छोड़ कर आ गए। फिर इनकी शादी कर दी गई। 14 मार्च 1954 में इन्होंने मस्ताना जी महाराज से नाम शब्द की प्राप्ति की।
मस्ताना जी महाराज ने चोला बदलने से पहले गुरुगद्दी के लिए एक सच्चे व्यक्ति की खोज करनी शुरू कर दी। खोज पूरी होने के बाद आखिरकार सरदार हरबंस सिंह जी को डेरा सच्चा सौदा के दूसरे गुरुगद्दी नशीन के लिए चुना गया। खोज के दौरान इनकी परीक्षा ली गई। यह हर परीक्षा में सफल होते गए। गुरु के प्यार में इन्होंने अपने ही हाथों से अपना ही घर तोड़ कर घर का सारा सामान बाँट दिया और अपना सर्वस्व गुरु के चरणों में समर्पित कर दिया।
28 फरवरी 1960 को इनको मस्ताना जी के द्वारा गुरुगद्दी पर विराजमान कर दिया गया और उसी समय इनका नाम सरदार हरबंस सिंह से शाह सतनाम सिंह जी कर दिया गया। इस दिन को इनके अनुयायी महारहमोकरम दिवस के रूप में मनाते हैं।

अपनी जीवोद्धार् यात्रा के दौरान उन्होंने 4142 सत्संग किए और 1,110,630 जीवों को नाम शब्द देकर भवसागर से पार किया।
सत्संगों के दौरान उन्होंने लोगों को झूठे रीति रिवाजों, कुरीतियों और पाखंडों से निकाल कर सच्ची इन्सानियत का पाठ पढ़ाया।
इन्होंने मूर्ति पूजा का खंडन, कन्या भ्रूण हत्या को रोकना, दहेज प्रथा को रोकना, नशे आदि जैसी कुरितियों से लोगों को दूर किया। इन्होंने सभी से प्रेम करना, सच्चा दान, इन्सानियत, प्रभु भक्ति आदि की शिक्षाऐं प्रदान की।
अंत में वो 23 सितंबर 1990 को मौजूदा गद्दीनशीन संत डॉ गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां को गुरुगद्दी पर बिठा कर 13 दिसंबर 1991 को ज्योति ज्योत समा गए।
जैसा कि हम पिछले कुछ आर्टिकल में पढ़ चुके हैं कि कैसे इनके अनुयायियों ने जनवरी का महीना अपने गुरु शाह सतनाम सिंह जी के जन्ममाह को मानवता भलाई के कार्य करके मनाया। क्या इनके अनुयायी इस महारहमोकरम माह को भी ऐसे ही मना रहे हैं? जानने के लिए इंतजार करिए हमारे अगले आर्टिकल का।

एक मुलाकात जो छोड़ गई गंभीर सवाल….
गर्मी की छुट्टियां बिताने निवेदिता काफी अरसे के बाद अपनी 12 वर्षीय बेटी देवांशी के साथ अपने पीहर पालमपुर आ रही थी। मरांदा रेलवे स्टेशन पर पांव पडते ही एक अलग सी रौनक उसके चेहरे पर आ गई। दिवांशी को साथ लेकर उसनें कदम टैक्सी स्टैण्ड की तरफ बडाऐ, तभी एक बेहद अपनी सी आवाज ने उसे पुकारा। रेलवे स्टेशन पर गाडिय़ों और आते-जाते लोगों के शोर के बीच उस अपनी सी आवाज को सुनकर निवेदिता के कदम वहीं रुके और अपनी बचपन की सबसे प्रिय सहेली सागरिका को सामने पाकर उसकी आखें सहसा चमक उठी। उसके मस्तिष्क पटल पर वो ‘घुग्गर स्कूल की पढाई’, वो ‘गोबिंद की मिठाई’, वो ‘शर्मा की कुल्फी’, वो कालेज की टिक्की’, वो ‘न्यूगल कैफे की हवा’ सब यादें एक साथ तस्वीर बन गऐ।

निवेदिता ने सागरिका को आलंगिन मे लिया और अपनी बेटी को उसका परिचय देते हुऐ कहने लगी, ये है मेरे बचपन की ‘बेस्टी’ और दोनों सहेलियां खिल-खिलाकर हंस पडी। सागरिका ने भी दिवांशी को प्यार दिया। सागरिका की शादी पालमपुर मे ही हुई थी और उसका ससुराल निवेदिता के घर के पास ही था, इसलिए दोनों ने एक ही टैक्सी लेने का मन बनाया ताकिं कुछ वक्त साथ मे बिताया जा सके।
चूंकि दोनो सहेलियां एक अरसे बाद मिल रही थी तो दोनों ने एक दूसरे के परिवार के बारे मे जानने के लिए उत्सुकता दिखाई। सागरिका के परिवार मे उसके पति और तीन बच्चे हैं। निवेदिता ने बताया वह अपने सास-ससुर, पति और बेटी के साथ नई दिल्ली मे रहती है, यह जानकर हैरानी भरे भाव से सागरिका ने पूछा, अच्छा तो फैमिली कब पूरी कर रही हो? निवेदिता उसकी हैरानी की वजह समझ चुकी थी, पर फिर भी मुस्कराहट के साथ जवाब देते हुऐ कहने लगी, परिवार तो पूरा ही है और हम सब खुशी से अपनी जिदंगी व्यतीत कर रहें है। “अरे तुम समझी नहीं, मेरा मतलब तुम्हारा वंश….? निवेदिता का जवाब फिर से एक सहज मुस्कराहट के साथ था “हमारी बेटी बढाऐगी हमारा वंश”। और इस बात का व्यावहारिक तौर पर क्या अधार है? सागरिका एक के बाद एक प्रश्नो के साथ तैयार थी।
अब बारी निवेदिता की थी वो सागरिका के सारे सवालों को सतुंष्ट करे। निवेदिता ने बताया कि उसके पति अनुराग हरियाणा के एक संत बाबा राम रहीम के अनुयायी है और वो उन्हीं के साथ एक बार… । उसकी बात को काटती हुई सागरिका बोली वोही बाबा राम रहीम जिनके बारे मे गत 1-2 सालों से मीडिया काफी कुछ दिखा रहा है, क्या तुम्हारे पति अब भी उनके अनुयायी हैं? निवेदिता ने कहा हां अब भी, और सिर्फ वो ही नही, मैं भी उनको अपना गुरु मानती हूँ।
सागरिका ने कहा आज तुम मुझे क्यों बार बार हैरान किए जा रही हो, जिस निवेदिता को मैं बचपन से जानती हूँ वो तो एकदम नास्तिक, तर्कशील सोच, वैज्ञानिक द्रष्टिकोण रखने वाली निवेदिता थी। तुम कब से बाबाओं और संतो की बात करने लगी। जब से अनुराग जी के साथ बाबा जी के आश्रम मे जाने का मौका मिला, निवेदिता का जवाब था। अपनी बात को पूरा करते हुए निवेदिता बोली बाबा राम रहीम सिर्फ एक आध्यात्मिक गुरु नहीं हैं, बल्कि एक समाज सुधारक भी हैं। धर्म के सच्चे अर्थों को वैज्ञानिक द्रष्टिकोण से इतनी सरलता से आमजन तक पहुंचाने वाले और ‘नर सेवा नरायण सेवा’ को यथार्थ रुप देने वाले एक सच्चे और सहासपूर्ण संत हैं। उनकी परहित की सोच ने उसे बहुत प्रभावित किया।
बाबा राम रहीम द्वारा चलाऐ मानवता भलाई कार्यों के एक लंबी सूची है जिसमें से एक है ‘कुल का क्राउन‘, जिसके तहत जिन माता पिता के इकलौती संतान बेटी है, वो शादी कर के लडके को अपने माता पिता के घर लाऐगी और ऐसी शादी से हुई संतान का नाम उसके माता पिता के नाम से होगा, तांकि उनका वंश आगे बढाया जा सके। और बाबा जी की प्ररेणा से ऐसे बहुत से लडके आगे आऐ हैं जो लडकी के मां-बाप को अपने मां-बाप के समान समझ कर उनका हर तरह से सहारा बन कर साथ रहेंगे। समाज मे भी इस नई सोच को सहारा गया हैं और इस मुहिम के तहत अब तक कई शादियां भी सम्पन्न हुई हैं।

मेरी दिवांशी भी हमारे कुल का दीपक नहीं ‘ताज’ बनेगी। निवेदिता की बातों से सागरिका के मन मे एक बेहद सकरात्मक समाज की तस्वीर बन रही थी। जिन बाबा राम रहीम के बारे वो मीडिया से ने जाने क्या कुछ अनाप शनाप सुन चुकी थी, आज उनकी सच्चाई जान कर वो उनसें काफी प्रभावित थी, वह बाबा जी और उनके मानवता भलाई के कार्यों के बारे मे और जानना चाहती थी, लेकिन निवेदिता का घर आ चुका था और जिदंगी के रुझानो के चलते अगली मुलाकात अनिश्चित थी।
सागरिका निवेदिता को तो अलविदा कह चुकी थी लेकिन अपने मन मै पैदा हुऐ सवालों की उत्सुकता को अलविदा न कह पाई, बाबा राम रहीम जैसे सच्चे संत जो समाज को सही राह दिखाते है, परहित के कार्य करते हैं आखिर उन्हें क्यों विरोध और यातनाएं सहनी पडती हैं? अगर सागरिका के सवालों का जवाब आपके पास हो तो हमे बताऐगा जरूर कमेंट बॉक्स मे।
हम बात कर रहे हैं सूरजकुंड मेले की, जो कि हर बार की तरह इस बार भी भरपूर जोश और उत्साह से पूर्ण है। अनेकों लोग यहां दूर दूर से अपनी कला से बनाया हुआ सामान बिक्री के लिए लाये हैं। अनेकों लोग यहां घूमने आये हुए हैं। इन्हीं अनेकों लोगों की तरह ही एक इंसान (जिसकी बात आपको बताने लगे हैं) मेला देखने आया था। मेले में आकर वो एक स्टॉल पर गया और सारी स्टॉल खरीद डाली। स्टॉल के इंचार्ज और अन्य लोगों के बीच ये बहुत बड़ा चर्चा का विषय बन गया क्योंकि कुल बिल 60 हज़ार के पास था। हुआ यूँ की मेले में पहुँच कर सोनू कुमार को पता लगा की जैसे अन्य कई जगहों से सामान बिक्री के लिए आया है, वैसे ही हरियाणा की जेलों से भी सामान आया है, इसी बीच उसकी नज़र उस स्टॉल पर पड़ी जहां पर रोहतक की सुनारिया जेल में बना हुआ सामान बिक्री के लिए पड़ा था। उसने उस स्टॉल पर जाकर सारा सामान खरीदने का आर्डर दे डाला। स्टॉल पर मौजूद इंचार्ज और अन्य लोगों की हैरानी की कोई सीमा नहीं रही क्योंकि उस सामान में कुर्सी, टेबल, फ्रूट टोकरी, आदि थे जिनकी सोनू जी को जरूरत भी नहीं थी।

जब इस बारे में इस व्यक्ति से बात की गई तो उसने पूछे जाने पर बताया कि जिस सामान की उनको जरूरत नहीं, वो भी इसलिए खरीदा है क्योंकि यह सामान सुनारिया जेल से आया है। उसने बताया कि वो डेरा सच्चा सौदा का श्रद्धालु है और इस वक़्त उनके गुरूजी सुनारिया जेल में हैं, इसी श्रद्धा भावना के चलते उसने सुनारिया जेल से आया सारा सामान ले लिया।
स्टॉल के इंचार्ज ललित भरद्वाज जी को जब सोनू कुमार के डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी होने का पता लगा तो इन्होंने इस बात पर यकीन कर लिया कि ये मुमकिन है कि किसी ने इतनी महँगाई के बावजूद सारी स्टॉल खरीद डाली।

कहते हैं कि मिसालें दी जाती हैं, भूली नहीं जाती, और अगर मिसाल श्रद्धा भावना की हो तो कोई कैसे भूल जाये! ये सब देख कर और जान कर एक ही बात कही जा सकती है कि श्रद्धा हो तो डेरा सच्चा सौदा के अनुयायियों जैसी, वरना न हो।