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Dera Chief Gurmeet Ram Rahim को मिली 50 दिनों की पैरोल

हरियाणा में स्थित डेरा सच्चा सौदा के Chief Baba Ram Rahim, जो आए दिन सुर्ख़ियों में रहते है उनको एक बार फिर पैरोल मिल चुकी है। आपकी जानकारी के लिए बता दें, इस बार यह पैरोल 50 दिनों के लिए मिली है। हरियाणा सरकार ने शुक्रवार को इस पैरोल के लिए मंजूरी दी है। जिसके तहत Dera Chief कभी भी जेल से बाहर आ सकते हैं। रोहतक की सुनारिया जेल में रह रहे Gurmeet Ram Rahim पहले भी कई बार पैरोल पर बाहर आ चुके हैं। हरियाणा सरकार का कहना है कि उन्हें यह Parole नियमों के आधार पर ही दी जाती है।

क्या Baba Ram Rahim को बार-बार Parole मिलना सही है?

आपकी जानकारी के लिए बता दें, आमतौर पर पैरोल कैदी की अस्थायी रूप से रिहाई होती है। लेकिन पैरोल कैदी के अनुरोध पर दी जाती है, जबकि पैरोल मिलना कैदी का क़ानूनी अधिकार है। पैरोल सरकार द्वारा जेल में बंद लोगों को दिया गया एक मौका है। जिसका उद्देश्य होता है की क़ैदी को कुछ समय तक जेल में रहने के बाद सामान्य जीवन में वापस आने में मदद मिले। Baba Ram Rahim की कहानी के मामले में, यह जानना बहुत महत्वपूर्ण है कि उन्हें पैरोल देना कोई साधारण बात नहीं है। इस बारे में हरियाणा सरकार का कहना है कि वह राम रहीम को पैरोल देकर कानून का पालन कर रहे है।

क्यों मिल रही है Baba Ram Rahim को बार-बार पैरोल?

आपको बता दें, साल में कोई भी कैदी तीन बार फरलो ले सकता है। फरलो पारिवारिक, व्यक्तिगत व सामाजिक गतिविधियों को पूरा करने के लिए दी जाती है। वहीं अगर बात करें Parole की, तो इसके लिए कारण बताना जरूरी होता है। पैरोल की अवधि एक महीने तक बढ़ाई जा सकती है। इस बार Baba Ram Rahim को 50 दिन के लिए Parole मंज़ूर की गई है। नियमों की बात करें, तो एक क़ैदी को साल में 98 दिन तक की पैरोल मिल सकती है। आपको बता दें की पैरोल के दौरान कैदी जेल के बाहर जो समय बिताते हैं उसे उनके कुल जेल के समय को कम किए बिना उनकी सजा के हिस्से के रूप में गिना जाता है।

इसलिए, जब हम Baba Ram Rahim के बारे में बात करते हैं, तो हमें यह समझना चाहिए कि यह कोई सहायता नहीं है बल्कि कानूनन अधिकार है। राम रहीम सिंह कानून का पालन कर रहा है। हमारी कानूनी प्रणाली हर किसी को उचित मौका देने के लिए इसी तरह काम करती है और Baba Ram Rahim भी क़ानून का सम्मान करते हैं।

Baba Ram Rahim को कितनी बार मिल चुकी है Parole-

2022 से लेकर अब तक Baba Ram Rahim की यह 7वीं पैरोल होगी। इसके साथ ही Baba अब तक 2 बार फरलो पर आ चुके है। आपको बता दें इस बार Parole के दौरान Dera Chief Baba Ram Rahim Uttar Pradesh के बागपत जिले के बरनावा आश्रम में रहेंगे। इस से पहले भी Dera Chief बरनावा आश्रम में ही रूकते आए हैं। हाल ही में, नवंबर 2023 में Gurmeet Ram Rahim को 21 दिनों की फरलो  दी गई थी। हालांकि कुछ क़ानूनी प्रक्रियाओं के चलते उन्हें डेरा सच्चा सौदा के सिरसा आश्रम में जाने की अनुमति नहीं दी जाती है। जिसके चलते Dera Chief वर्चुअल माध्यमों के द्वारा अपने अनुयायियों से रू-ब-रू होते रहे है।

क्या सच में Baba Ram Rahim की पैरोल को लेकर दी जाती है अतिरिक्त ढील?

आपकी जानकारी के लिए बता दें, इस बारे में दिल्ली हाईकोर्ट के अधिवक्ता अरुण शर्मा से जब पूछा गया कि क्या बाबा राम रहीम को बार-बार पैरोल देते हुए ढील बरती जा रही है? तो इस पर अधिवक्ता ने कहा कि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। कोई भी कैदी अपनी सजा का कुछ हिस्सा जेल में बिता चुका है और इस दौरान उसका व्यवहार और आचरण ठीक रहा है तो उसे पैरोल दी जा सकती है। उन्होंने बताया कि हर साल तिहाड़ जेल से सैकड़ों कैदी पैरोल पर बाहर आते हैं। उन्होंने बताया दरअसल, जब हम बड़े मामलों से जुड़े अपराधियों पर ज्यादा गौर करते हैं, तो हमें लगता है कि उनको अतिरिक्त सुविधा दी जा रही है। जबकि सत्य यह है की ऐसा बिलकुल नहीं होता है। यह राज्य सरकार का विशेषाधिकार होता है। अगर सरकार को लगता है कि सजा काट रहे व्यक्ति के आचरण में सुधार है, उसके आवेदन का आधार मजबूत है और उसकी रिहाई से किसी को कोई नुकसान नहीं है, तो उसे पैरोल दी जा सकती है।

बाबा राम रहीम (Baba Ram Rahim) की पैरोल को लेकर लोगों की प्रतिक्रिया-

बाबा राम रहीम की पैरोल इन दिनों काफी सुर्खियों में बनी हुई है। यह एक ऐसा विषय है जो social media पर बहुत चर्चा में है। समाचारों में और जनता में Baba Ram Rahim Singh के पैरोल की ख़बर आते ही काफी हलचल पैदा हो जाती है। सिक्के के अगर एक पहलू की तरफ़ देखें तो कुछ लोग बाबा राम रहीम की पैरोल की ख़बर सुनते ही वाद विवाद शुरू कर देते हैं। वहीं बड़ी संख्या में ऐसे भी लोग हैं, जो बाबा राम रहीम के आने का बेसब्री से इंतज़ार करते है। उनका मानना है कि जब इनके गुरु जी पैरोल पर आते हैं, तो वह अपने श्रद्धालुओं को इंसानियत की शिक्षा व परहित कार्यों को करने का आह्वान करते है। हैरानी कर देने वाली बात यह है कि इन लोगों का मानना है कि बाबा राम रहीम हर नेक कार्य की शुरुआत स्वयं करते हैं उसके बाद ही लोगों को वह कार्य करने का आह्वान करते है ।

Parole मिलते ही आख़िरकार करते क्या है 

आइए आज Baba की Parole की कहानी पर विचार डालते है की आख़िरकार Ram Rahim जेल के बाहर अपना समय कैसे बिताते हैं। हालाँकि, Baba Ram Rahim को कई बार पैरोल मिल चुकी है। इस बार भी बाबा को 50 दिन की पैरोल मंजूर हुई है। आइए गौर करते है कि इस अवधि के दौरान बाबा करते क्या है। बाबा राम रहीम समाचार की रिपोर्टों ने विभिन्न welfare works में उनकी भागीदारी पर प्रकाश डाला है, जो समाज पर सकारात्मक प्रभाव डालने के उनके प्रयासों को प्रदर्शित करता है।

बाबा राम रहीम ऑनलाइन सत्संगों के माध्यम से करते है लाखों लोगों को जागरूक-   

बाबा राम रहीम के अनुयायियों का आँकड़ा 6 करोड़ को पार कर चुका है। ग़ौरतलब है की उनके हर सत्संग पर लाखों लोग नशा छोड़ने के लिए आते है और राम नाम का रसपान करते है। जेल से बरनावा आश्रम में पधारने के बाद बाबा राम रहीम का ऑनलाइन सत्संग करते है, जिसमें ब्लॉक स्तर पर बने सत्संग घरों में हज़ारों लोग शामिल होते हैं और ऐसे हर सत्संग घर का मिलाकर देखें तो लाखों लोगों का हुजुम इकट्ठा होता है बाबा के प्रवचन सुनने के लिए। बाबा का मात्र एक सत्संग सुनने से हज़ारों लोग रोज़ाना नशा व बुराइयाँ छोड़ देते हैं व आगे से न करने का प्रण करते हैं। लोगों की बुराइयाँ छुड़वाने से बाबा का ऑनलाइन समागम सम्पन्न होता है ।

Baba Ram Rahim ने Parole के दौरान शुरुआत की नशा मुक्त अभियान की और नाम दिया “Depth Campaign”-

आज समाज में नशों का दरिया बह रहा है। इस नशे रूपी दैत्य को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए बाबा राम रहीम ने Parole के दौरान Depth Campaign की शुरुआत की। इस मुहीम का उद्देश्य देश को, विशेषकर युवा पीढ़ी को नशीली दवाओं की लत और अन्य मादक द्रव्यों के सेवन से बचाना है।

राम रहीम की पैरोल के दौरान शुरू हुआ यह अभियान युवाओं को नशे रूपी दैत्य को समाज से दूर भगाने व युवा पीढ़ी को नशे की लत से उबरने के लिए सशक्त बनाता है। लोगों का दावा है कि इस मुहीम से जुड़कर लाखों लोगों ने नशे रूपी दैत्य का त्याग किया है।

Gurmeet Ram Rahim जब भी पैरोल पर बाहर आए हैं, वे अपना समय मानवता को समर्पित करते रहे हैं। अपने इस समय में उन्होंने कई मुहिम शुरू की, जिसके तहत देश को नशा मुक्त बनाने का उनका प्रयास प्रमुख रहा। इसके लिए उन्होंने डेप्थ(DEPTH) और सेफ(SAFE) मुहिम चलाई और नशों के खिलाफ समाज को जागरूक करने के लिए कई भाषाओं में गीत भी बना चुके हैं। जिनसे प्रभावित होकर लाखों की संख्या में लोग हर बार नशे को छोड़कर स्वस्थ समाज की ओर कदम बढ़ाते हैं। इसके साथ ही Dera Sacha Sauda के अनुयायियों ने बाबा राम रहीम की रहनुमाई में गत वर्ष जनवरी 2023 में पूरे हरियाणा व राजस्थान को 5 से 6 घंटो में स्वच्छता अभियान चलाकर शीशे की तरह चमका दिया था।

Baba Ram Rahim को Parole मिलना समाज के लिए कितना सही है?

जिस प्रकार हमारा देश व समाज आए दिन बुराइयों की चर्म सीमा पर जा रहा है। युवा पीढ़ी नशे की दलदल में फँसी हुई है। देश में अपराध दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में ज़रूरत है समाज सुधारक की, जो हमारे समाज को नई दिशा दे, जो बुराइयों का ख़ात्मा करे, मरती हुई इंसानियत को पुनर्जीवित करे । बाबा राम रहीम अब तक 6 करोड़ से अधिक लोगों की बुराइयाँ छुड़वा चुके है। उनकी शिक्षाओं पर चलकर आज लाखों लोग 161 मानवता भलाई के कार्य पूरे जोश के साथ कर रहे हैं। बाबा राम रहीम की हमारे समाज को बहुत ज़रूरत है।

Conclusion-

आज आपके साथ पैरोल से जुड़ी कुछ बातें साँझा की और आपने बाबा राम रहीम से जुड़ी कुछ बातें जानी। बाबा द्वारा किए जा रहे मानवता भलाई के कार्यों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। उनका आचरण इस बात पर पुनर्विचार करने के लिए कहता है कि हम उनकी पैरोल को कैसे देखते हैं सकारात्मक या नकारात्मक!

Dera Chief Gurmeet Ram Rahim को मिली 50 दिनों की पैरोल

हरियाणा स्थित डेरा सच्चा सौदा के Chief जो आए दिन सुर्ख़ियों में रहते है उनको एक बार फिर मिली पैरोल। इस बार यह पैरोल 50 दिनों के लिए मिली है। हरियाणा सरकार ने शुक्रवार को इस पैरोल के लिए मंजूरी दी है। जिसके तहत Dera Chief कभी भी जेल से बाहर आ सकते हैं। रोहतक की सुनारिया जेल में रह रहे Gurmeet Ram Rahim पहले भी कई बार पैरोल पर बाहर आ चुके हैं। हरियाणा सरकार का कहना है कि उन्हें यह फरलो नियमों के आधार पर ही दी जाती है।

आख़िरकार Baba Ram Rahim को कितनी बार मिल चुकी है Parole-

2022 से अब तक उनकी यह 7 वीं पैरोल होगी। पैरोल के दौरान Dera Chief यू.पी. के बागपत जिले के बरनावा आश्रम में रहेंगे। इससे पहले भी Dera Chief बरनावा आश्रम में ही रूकते आए हैं। हाल-फिलहाल नवंबर 2023 में Gurmeet Ram Rahim को 21 दिनों की पैरोल दी गई थी। हालांकि कुछ कारणों के चलते उन्हें सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा आश्रम में जाने की अनुमति नहीं दी जाती है। जिसके चलते Dera Chief वर्चुअल माध्यमों के द्वारा अपने अनुयायियों से रू-ब-रू होते रहे है।

क्या सच में Baba Ram Rahim की पैरोल को लेकर दी जाती है अतिरिक्त ढील?

आपकी जानकारी के लिए बता दें, इस बारे में दिल्ली हाईकोर्ट के अधिवक्ता अरुण शर्मा से जब पूछा गया कि क्या बाबा राम रहीम को बार-बार पैरोल देते हुए ढील बरती जा रही है? तो इस पर अधिवक्ता ने कहा कि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। कोई भी कैदी अपनी सजा का कुछ हिस्सा जेल में बिता चुका है और इस दौरान उसका व्यवहार और आचरण ठीक रहा है तो उसे पैरोल दी जा सकती है। उन्होंने बताया कि हर साल तिहाड़ जेल से सैकड़ों कैदी पैरोल पर बाहर आते हैं। उन्होंने बताया दरअसल, जब हम बड़े मामलों से जुड़े अपराधियों पर ज्यादा गौर करते हैं, तो हमें लगता है कि उनको अतिरिक्त सुविधा दी जा रही है। जबकि सत्य यह है की ऐसा बिलकुल नहीं होता है। यह राज्य सरकार का विशेषाधिकार होता है। अगर सरकार को लगता है कि सजा काट रहे व्यक्ति के आचरण में सुधार है, उसके आवेदन का आधार मजबूत है और उसकी रिहाई से कोई नुकसान नहीं है तो उसे पैरोल दी जा सकती है।

बाबा(Baba Ram Rahim) की पैरोल को लोगों की प्रतिक्रिया-

राम रहीम की पैरोल इन दिनों सुर्खियों में बनी हुई है। यह एक ऐसा विषय है जिस पर समाचारों और जनता में बाबा राम रहीम सिंह की पैरोल की ख़बर आते ही काफी हलचल पैदा हो जाती है। सिक्के के अगर एक पहलू की तरफ़ देखें तो कुछ लोग बाबा राम रहीम की पैरोल की ख़बर सुनते ही वाद विवाद शुरू कर देते हैं। वहीं बड़ी संख्या में ऐसे भी लोग हैं, जो बाबा राम रहीम के आने का बेसब्री से इंतज़ार करते है। उनका मानना है कि जब इनके गुरु जी पैरोल पर आते हैं, तो वह अपने श्रद्धालुओं को इंसानियत की शिक्षा व परहित कार्यों को करने का आह्वान करते है। हैरानी कर देने वाली बात यह है कि इन लोगों का मानना है कि बाबा राम रहीम हर नेक कार्य की शुरुआत स्वयं करते हैं उसके बाद ही लोगों को वह कार्य करने का आह्वान करते है ।

Gurmeet Ram Rahim जब भी पैरोल पर बाहर आए हैं, तो अपना समय मानवता को समर्पित करते रहे हैं। अपने इस समय में उन्होंने कई मुहिम शुरू की, जिसके तहत देश को नशा मुक्त बनाने का उनका प्रयास प्रमुख रहा। इसके लिए उन्होंने डेप्थ(DEPTH) और सेफ(SAFE) मुहिम चलाई और नशों के खिलाफ समाज को जागरूक करने के लिए कई भाषाओं में गीत भी बना चुके हैं। जिनसे प्रभावित होकर लाखों की संख्या में लोग हर बार नशे छोड़कर स्वस्थ समाज की ओर कदम बढ़ाते हैं।

Dera Chief को मिली इस पैरोल से डेरा प्रेमियों से चेहरे खिल उठे हैं। Baba Ram Rahim जब भी बाहर आते हैं, तो करोड़ों अनुयायी उनके द्वारा चलाये जा रहे 161 मानवता भलाई के कार्यों द्वारा अपनी खुशी जाहिर करते हैं। जनवरी 2023 में पूरे हरियाणा व राजस्थान को 5 से 6 घंटो में स्वच्छता अभियान चलाकर शीशे की तरह चमका दिया था। Dera Chief की फरलो उनके अनुयायियो के लिए किसी त्योहार के समान होती है।

Conclusion

आज आपके साथ पैरोल से जुड़ी कुछ बातें साँझा की और आपने बाबा राम रहीम से जुड़ी कुछ बातें जानी। बाबा द्वारा किए जा रहे मानवता भलाई के कार्यों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। उनका आचरण इस बात पर पुनर्विचार करने के लिए कहता है कि हम उनकी पैरोल को कैसे देखते हैं सकारात्मक या नकारात्मक!

गुरु गोबिन्द सिंह जी जयन्ती (Guru Gobind Singh Ji Jayanti)

धर्म के प्रचार, सत्य की जीत और अन्याय को रोकने के लिए समय-समय पर संत, योद्धा और महापुरुष अवतार लेते रहते हैं। ऐसे ही महान शख्सियत हुए गुरु गोबिन्द सिंह जी, जो सिखों के दसवें गुरु थे। धर्म की रक्षा करने और अत्याचारों को रोकने के लिए गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपना सब कुछ समर्पित कर दिया था। प्रतिवर्ष हिंदू पंचांग के अनुसार पौष मास की शुक्ल सप्तमी को गुरु गोबिंद सिंह जी जयन्ती मनाई जाती है। उनकी शिक्षाओं की पालना आज भी बड़ी शिद्दत से की जाती है।
जीवन वृत्तांत :
गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म 22 दिसंबर 1666 को पिता गुरु तेग बहादुर जी और माता गुजरी जी के घर बिहार के पटना में हुआ। उनका बचपन का नाम गोबिंद राय था, जिसे बाद में गुरु गोबिंद सिंह के रूप में जाना जाने लगा। बचपन के कुछ वर्ष पटना में रहने के पश्चात् उनका परिवार 1670 में पंजाब के आनंदपुर साहिब में आकर रहने लगा। उस स्थान को पहले चक्‌क नानकी के नाम से जाना जाता था। यहाँ उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और एक कुशल योद्धा बनने के लिए सभी कलाएं सीखी। उन्होने संस्कृत और फारसी भाषा का ज्ञान प्राप्त किया |
गोबिंद राय जी की तीन पत्नियाँ थी। 10 वर्ष की उम्र में उनका पहला विवाह माता जीतो के साथ हुआ। जुझार सिंह, जोरावर सिंह और फतेह सिंह उनके और माता जीतो के पुत्र थे। 17 वर्ष की आयु में उनका दूसरा विवाह माता सुन्दरी के साथ हुआ। उनका एक बेटा हुआ, जिसका नाम अजित सिंह था। माता साहिब देवन उनकी तीसरी पत्नी थी, जिनके साथ उनका विवाह 33 वर्ष की आयु में हुआ था।
महान् कवि और लेखक :
गुरु गोबिंद सिंह जी ( Guru Gobind Singh Ji ) एक कुशल योद्धा और गुरु होने के साथ-साथ वि‌द्वानों के संरक्षक भी थे। वे मधुर वाणी के धनी थे। उनके दरबार में 52 कवि और लेखक मौजूद हुआ करते थे। कई भाषाओं मे निपु‌णता रखने वाले गुरु गोबिंद सिंह जी ने कई सारे ग्रंथों की रचना की थी। उनकी रचनाए आज भी समाज को प्रभावित करती हैं। सिखों के पवित्र धर्म ग्रंथ ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ जी की रचना गोबिंद सिंह जी ने ही की थी। उनकी कुछ अन्य रचनाएं इस प्रकार से हैं –
जाप माहिब
• जफर नामा
• बचित्र नाटक
• अकाल उत्सतत
• खालसा महिमा
सिखों के दसवें गुरु :
गुरु गोबिंद सिंह जी (Guru Gobind Singh Ji) के पिता गुरु तेग बहादुर जी सिखों के नौवें गुरु थे। एक बार कश्मीरी पंडित अपनी फरियाद लेकर श्री गुरु तेग बहादुर जी के दरबार में आए। उनसे जबरदस्ती धर्म परिवर्तन करवाकर मुसलमान बनाया जा रहा था। उनके सामने शर्त रखी गयी थी कि कोई ऐसा महापुरुष हो जो इस्लाम धर्म स्वीकार नहीं करने के बदले अपना बलिदान दे सके, तो उन सबका भी धर्म परिवर्तन नहीं किया जाएगा।
उस समय गुरु गोबिंद सिंह जी नौ वर्ष के ही थे। करमीरी पंडितों की यह बात सुनकर उन्होंने अपने पिता से कहा कि उनसे बड़ा महापुरुष और कौन हो सकता है, जो धर्म की रक्षा के लिए अपना बलिदान दे सके। उनकी इस बात से गुरु तेग बहादुर जी स्वयं को बलिदान करने के लिए तैयार हो गए। इस्लाम स्वीकार न करने के कारण 11 नवंबर 1675 को औरंगजेब ने दिल्ली के चाँदनी चौक में उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। इस घटना के पश्चात् 29 मार्च 1676 को श्री गोविंद राय जी को सिखों का दसवां गुरू घोषित कर दिया गया।
खालसा पंथ की स्थापना :
धर्म की रक्षा करने और बढ़ते हुए अत्याचारों का सामना करने के लिए गुरु गोबिंद सिंह जी ने सिख कौम बनाई। 13 अप्रैल 1699 को वैसाखी के दिन गुरु श्री गोबिंद सिंह जी ने *खालसा* पंथ की स्थापना की। वहाँ मौजूद लोगों से उन्होंने पूछा कि ऐसा कोई हो जो धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर सके तो वह आगे आए। तब एक-एक कर पाँच लोग शहीदी के लिए तैयार हुए। उन 5 सिखों को गुरु जी ने ‘पंज प्यारे’ का नाम दिया और उन्हें अमृत’ का रसपान करवाया। तब उन्हें ‘सिंह’ की उपाधि भी दी गई। उसी समय से गुरु साहिब ने स्वंय को भी ‘सिंह’ बना लिया और उन्हें गुरु गोबिंद सिंह जी के नाम से पहचाना गया। खालसा की स्थापना कर उन्होंने सिंह फौज बनाई, जो बहादुरी और ज़ाबाजी से शोषण और अत्याचारों का सामना करे और धर्म की रक्षा व प्रचार कर सके।
सवा लाख से एक लड़ाऊ,
चिड़ियों सो मैं बाज तड़ऊ,
तभी गोविंद सिंह नाम कहाऊ…
‘अमृत’ का रसपान कर सिंह बनने वाले सिखों के लिए पंज ककार धारण करना अनिवार्य होते हैं। पांच ककारो में केश, कंघा, कड़ा, कृपाण और कछैरा सिख धर्म में विशेष महत्त्व रखते हैं और उनके धर्म के प्रति उनके समर्पण को दर्शाते हैं।
शहादत :
सत्य को स्थापित करने और अधर्म को रोकने के लिए गुरु गोबिंद सिंह जी ने मुगलों के खिलाफ 13 युद्ध लड़े। छोटी सेना होने के बावजूद भी उन्होंने बड़ी निडरता और कुशलता से हर बार मुगलों पर जीत हासिल की। औरंगज़ेब की मृत्यु के पश्चात् बहादुर शाह को बादशाह बनने में गुरू गोबिंद सिंह जी ने मदद की थी। उनके बनते मीठे रिश्तों को देखकर सरहिंद का नवाब वजीर खाँ डर गया। उसने अपने दो आदमी गुरु जी के पीछे लगा दिए, जिन्होंने धोखे से गुरु साहिब पर वार किया, जिससे 7 अक्तूबर 1708 को गुरु गोबिंद सिंह जी नांदेड साहिब में दिव्य ज्योति में समा गए।
उन्होने अपने अंत समय में सिक्खों को गुरु ग्रंथ साहिब को अपना गुरु मानने को कहा और स्वयं भी गुरु ग्रंथ साहिब के सामने नतमस्तक हुए थे। गुरु जी के बाद माधोदास ने, जिसे गुरु गोबिंद जी ने बंदा बहादुर का नाम दिया था, सरहिंद पर आक्रमण किया और गुरु जी की शहादत का बदला लिया।
गुरु गोबिंद सिंह जी के चार साहिबजादों में से बाबा अजीत सिंह और बाबा जोझार सिंह को स्वंय गुरु जी ने मुगलों के खिलाफ युद्ध के लिए चमकौर भेजा था, जो वहाँ शहीद हो गए थे और दो साहिबजादों जोरावर सिंह व बाबा फतेह सिंह व माता गुजरी को वजीर खां ने पकड़ लिया था। उसने दोनों साहिबजादों को जिंदा ही दिवार में चिनवा दिया था और वे भी शहादत को प्राप्त हुए।
गुरु गोबिंद सिंह जी (Guru Gobind Singh Ji ) की पवित्र शिक्षाएं:
गुरु जी ने सिख धर्म का प्रचार किया और लोगों को जीने की सही राह दिखाई। उन्होंने अपने उपदेशों के द्वारा लोगों का उद्धार किया। गुरु साहिब की पवित्र शिक्षाएं आज भी लोगों को प्रभावित करती हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं-
धरम दी किरत करनी : अपनी जीविका ईमानदारी पूर्वक काम करते हुए चलाएं ।
जगत-जूठ तंबाकू बिखिया दी तियाग करना : हमेशा नशे व तंबाकू के सेवन से दूर रहें।
किसी दि निंदा, अते इर्खा न करना : इसका अर्थ है कि कभी भी किसी दूसरे की निंदा-चुगली नहीं करनी चाहिए। दूसरों से ईर्ष्या करने की जगह स्वयं मेहनत करनी चाहिए।
बचन करकै पालना : अगर आप किसी को कोई वचन देते हैं, तो उसकी पालना करनी चाहिए। यानि हर कीमत पर अपने वचन को निभाना चाहिए।”
कम करन विच दरीदार नहीं करना : व्यक्ति को अपने काम करने में खूब मेहनत करनी चाहिए, किसी तरह की टाल-मटोल या लापरवाही नहीं चाहिए।
गुरबानी कंठ करनी: गुरु गोबिंद सिंह जी के इस बचन का अर्थ है कि गुरुवाणी को कंठस्थ कर लें और उसकी पालना करें।
दसवंड देना : हर व्यक्ति को अप‌नी कमाई का दसवां हिस्सा दान में दे देना चाहिए और दूसरों की मदद करनी चाहिए।
कैसे मनाई जाती है गुरु गोबिंद सिंह जी की जयंती ( Guru Gobind Singh Ji Jayanti) :
इस बार गुरु गोविंद जी की 357 वीं जयंती मनाई जा रही है। इसे प्रकाश पर्व के रूप में मनाया जाता है। विशेष महत्व रखने वाले इस दिन को सिख समुदाय के लोग बहुत धूमधाम से मनाते हैं। पहले दिन नगर कीर्तन व जूलूस निकाला जाता है। इस दिन लोग सुबह जल्दी उठकर, नहाकर व नए कपड़े पहनकर गुरुद्वारे जाते हैं। वहाँ पवित्र भावना से मथ्था टेकते हैं और अपने परिवार व समाज की भलाई के लिए अरदास करते हैं। इस दिन विशाल लंगर का आयोजन किया जाता है। भजन-कीर्तन व पवित्र गुरबानी का पाठ किया जाता है और इस प्रकाश पर्व के उत्सव को मनाया जाता है।

लोहड़ी

त्योहार और उत्सव-समारोह ही ऐसे अवसर होते हैं, जो जीवन को खुशियों से भरे रखते हैं और भाईचारे को बनाए रखते हैं। ऐसे मौकों पर ही एक दूसरे से मिलते हैं, जश्न मनाते हैं, मिठाइ‌याँ बाँटते हैं और पूजा-अनुष्ठान करते हैं। वर्षभर कोई न कोई त्यौहार सभी को आपस में जोड़े रखते हैं। साल के शुरू होते ही लोहड़ी का त्योहार आता है। तिल, गुड़ और अग्नि को समर्पित इस त्योहार को पूरे भारतवर्ष में हर्षोल्लास से मनाया जाता है।

लोहडी का पर्व :

मकर संक्रांति से पहले दिन मनाया जाने वाला लोहड़ी का त्योहार साल का सबसे प्रथम त्योहार होता है। लोहड़ी को पहले ‘तिलोड़ी’ नाम से जाना जाता था, जो तिल और रोड़ी (गुड की रोड़ी) दो शब्दों से मिलकर बना था। धीरे-धीरे लोग इसे लोहड़ी कहने लगे। यह पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और पूरे उत्तरी भारत में बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है। पंजाबी समुदाय के लोगों के लिए लोहड़ी पर्व का विशेष महत्व है।

लोहड़ी का त्योहार (Lohri Festival ) अधिकांशत: 13 जनवरी को मनाया जाता है। किसानों के लिए खास इस त्योहार को समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। इस दिन सूर्य और अग्नि पूजा का विशेष महत्त्व है। सभी मिल-जुल कर अलाव लगाते हैं, गुड़, रोड़ी, मूंगफली, मक्की आदि खाते हैं। भांगडा-गिद्दा करते हैं और खुशी मनाते हैं। नवविवाहित जोड़ों और बच्चों की पहली लोहड़ी को बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।

लोहड़ी का महत्व :

लोहड़ी का त्योहार( Lohri Festival ) हिंदू कैलेंडर के अनुसार पौष माह की आखिरी रात को मनाया जाता है। विशेष रूप से शरद ऋतु के समापन पर इस त्यौहार को मनाने का प्रचलन है। लोहड़ी के बाद दिन बड़े होने लगते हैं, यानि माघ मास शुरू हो जाता है। सूर्य पृथ्वी से दूर जाने लगता है और मकर रेखा में प्रवेश कर जाता है।

सामान्यतः त्यौहारों का संबंध प्रकृति और फसलों से होता है। ऐसे ही सर्दियों की फसल में गेहूँ की बिजाई अक्तूबर में की जाती है, जिसकी कटाई मार्च-अप्रैल में होती हैं। लोहड़ी पर्व के समय तक यह फसल पकनी शुरु होने लगती है। जिसकी भरपूर उपज और समृद्धि की कामना करते हुए किसान यह त्यौहार मनाते हैं और अग्नि में अब तक की फसलों, तिल, दालें, मक्का, आदि का अर्पण कर भोग लगाते हैं। ऐसा माना जाता है कि अग्नि में भोग लगाने से सभी देवी- देवताओं को भोग लग जाता है। इस दिन गरीबों को दान दिया जाता है और बच्चों को लोहड़ी बाँटी जाती है। इस दिन विवाहित कन्याओं को उपहार व मिठाइयाँ देने का भी विशेष महत्त्व है।

लोहड़ी का त्यौहार( Lohri Festival ) क्यों मनाया जाता है:

इसका संबंध सती के त्याग से माना जाता है। पुराणों के आधार पर इसे सती के त्याग के रूप में प्रतिवर्ष याद करके मनाया जाता है। कथानुसार, प्रजापति दक्ष ने अपने यहाँ विशेष अनुष्ठान का आयोजन किया। सती के वहाँ पहुंचने पर राजा दक्ष ने उसका व उसके पति महादेव शिव का तिरस्कार किया। अपने पिता के द्वारा उनके जामाता को आमंत्रित न करने व उनका निरादार करने से आहत सती ने अपने आप को अग्नि को समर्पित कर दिया। इससे शिव आवेश में आ गए और सभी ऋषियों, देवताओं द्वारा समझाने पर शांत हुए। उसी दिन को एक पश्चाताप के रूप में मनाया गया और इसी कारण घर की विवाहित बेटी को इस दिन तोहफे दिए जाते हैं और भोजन पर आमंत्रित कर उसका मान सम्मान किया जाता है। इसी खुशी में श्रृंगार का सामान सभी विवाहित महिलाओं में बाँटा जाता है।

दुल्ला भट्टी की एतिहासिक कथा :

लोहड़ी पर्व( Lohri Festival ) के पीछे एक पुरानी कथा भी है। यह अकबर के शासनकाल की है। दुल्ला भट्टी उस समय पंजाब प्रांत का नामी लूटेरा था। जो धनी लोगों से लूटपाट करता। माना जाता है कि एक बार सुन्दरी मुन्दरी नाम की दो लड़कियों के माता-पिता नहीं थे और उन्हें जबरन बेचा जा रहा था। तब दुल्ला भट्टी ने उन्हें बचाया और उनकी शादी गांव के लड़कों से करवा दी। उसने सर्द रात के अंधेरे में ही आग जलाकर उनकी शादियाँ कर दी और शगुन के तौर पर उनकी झोली में सेर (एक नाप) शक्कर डालकर उनके पिता का फर्ज निभाया। वह उस इलाके के नायक के रूप में जाना जाने लगा था। तभी लोहड़ी का यह त्यौहार दुल्ला भट्टी के गीत के साथ ही मनाया जाता है –

सुन्दरी, मुन्दरिये … हो,

तेरा कौन विचारा … हो,

दुल्ला भट्टी वाला … हो,

दुल्ले धी व्याही … हो,

सेर शक्कर पाई … हो,

……….

लोहडी पर खास :

त्यौहारों का विशेष संबंध पकवानों से रहता ही है। सरसों का साग, मक्के की रोटी खासतौर पर बनाया जाता है। लोहड़ी के दिन तिल, मूंगफली, रेवड़ी, गज्ज़क, फुल्ले लोहड़ी की पहचान होते हैं। रात को अलाव पर इक्ट्‌ठे होकर किया जाने वाला भांगड़ा और गिद्दा रौनक भी लगाते हैं और खुशी भी बिखेरते हैं। घर में नवविवाहित जोड़े या नन्हें बच्चे की पहली लोहडी को बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। उनकी तरफ से पूरे मुहल्ले और भाईचारे में उपहार व मिठाइ‌याँ बाँटे जाते हैं। गरीबों को तिलपट्टी, मूंगफली, कपड़े, गुड व अन्य चीज़ें दान में दी जाती है।

ऐसे मनाते हैं लोहडी पर्व :

कई इलाकों में तो लोहड़ी की तैयारियाँ कई दिनों पहले ही शुरू हो जाती हैं। बच्चे टोलियाँ बनाकर लोहड़ी माँगने घर-घर जाते हैं। लोहड़ी के गीत गाकर व ढोल बजाकर वे सभी से लोहड़ी माँगते हैं। उन्हें खुशी के साथ मूंगफली, रेवड़ी, मक्की, टॉफी, आदि चीजें दी जाती हैं। लोहड़ी वाले दिन सभी सज-धज कर, पारंपरिक पोशाक पहनकर पड़ोसियों और संबंधियों को मिलते हैं व बधाईयाँ देते हैं। शाम के समय सभी आपस में मिलकर किसी खुली जगह पर अलाव लगाते हैं, उसमें अग्नि को गुड़, तिल व भुट्टा आदि अर्पित करते हैं। फिर वहाँ सभी को लोहड़ी बाँटी जाती है। जिनके यहाँ कोई नई शादी हुई होती है या बच्चे का जन्म हुआ होता है, तो ढोल या डी.जे. पर जमकर भांगडा व गिद्दा किया जाता है। लोहड़ी पर घर की विवाहित बेटियों को उपहार व मिठाइ‌याँ भेजी जाती हैं।

निष्कर्ष-

त्योहार एकता व भाईचारे की मिसाल होते हैं। पवित्रता का प्रतीक लोहड़ी का यह त्यौहार स्त्री सम्मान का सूचक है। अग्नि को तिल, मक्का आदि अर्पित कर किसान सभी के लिए खुशहाली, समृद्धि व अच्छी फसल की कामना करते हैं। यह माँगा जाता है कि आने वाला वर्ष सभी के लिए हर्षोल्लास से भरा हो और सुखमयी हो। द्वार पर आने वाले बच्चों को खुशी-खुशी विदा किया जाता है व एक परिवार की खुशी में ही सारा मोहल्ला जश्न मनाता है। इस तरह लोहडी हमें एकता व प्रेम के सूत्र में पिरो देती है।

(History of celebrating New Year and how to celebrate New Year )नए साल मनाने का इतिहास और नए साल को किस तरीके से मनाए –

आप सभी को जानकर बहुत ख़ुशी होगी कि आख़िर वह लम्हा आ गया, जिसका हम सभी को बेसब्री से इंतज़ार था। जी हाँ, नया साल आ गया है। आप सभी को नव वर्ष (New Year 2024)2024 की हार्दिक शुभकामनाएं। नया साल(New Year) हम सभी के लिए नई-नई खुशियां लेकर आए। सभी को बहुत शौक़ होता है कि हम ऐसा इस नए साल में क्या करें, जिससे हमारा नया साल स्पेशल बन जाए। हर कोई नए साल के लिए अपनी अपनी तरफ से प्लानिंग करता है कि हम नए साल को इस तरह से मनाए, यह करे, इसे इस तरह से मनाएं। आइए जानते हैं नए साल से जुड़ी कुछ बातें।

नए साल(New Year) को हम 1 जनवरी को ही क्यों मनाते हैं-

नया साल(New Year) एक जनवरी को मनाया जाता है, क्योंकि यह ग्रीगोरियन कैलेंडर के अनुसार साल का पहला दिन होता है। इसके पीछे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारण हैं। ग्रीगोरियन कैलेंडर को पृथ्वीवासियों के सामंजस्यपूर्ण समय को संगत बनाने के लिए 16वीं सदी में पूरी दुनिया में लागू किया गया था, जिसके अनुसार साल 365 दिनों का होता है और हर चौथे साल  में एक दिन अधिक होता है। नया साल(New Year) नई उम्मीदों की शुरुआत का प्रतीक होता है और लोग इसे परिवार और दोस्तों के साथ खुशी और आत्मविश्वास के साथ मनाते हैं।

आईए जानते हैं कि हम नए साल(New Year) को बहुत कैसे बना सकते हैं –

नए साल को हर कोई अपने-अपने तरीके से प्लान करता है।
हर कोई इस अवसर को बहुत खास बनाना चाहता है।
आइए हम जानें कि नए साल को खास कैसे बनाए।

नए साल(New Year) के दिन करें यह कार्य –

  • परिवार के साथ घूमने कहीं बाहर जाए –
नए साल के शुभ अवसर पर आप परिवार के साथ कहीं घूमने बाहर जा सकते हैं। सर्दी के मौसम में बाहर घूमने का अलग ही आनंद होता है। दूसरा आप परिवार को समय से दे। इस साल आप शिमला, मनाली, कुल्लू या राजस्थान आदि में कहीं घूमने का प्लान बना सकते है, ताकि ये साल परिवार वालों के लिए बहुत खास बन जाए।
घर में पूजा-पाठ करें –
नया साल सभी की जिंदगी में खुशियां ही खुशियां लेकर आए इसकी कामना करते हुए हम नए साल(New Year)के दिन घर में पूजा का आयोजन भी कर सकते हैं, ताकि भगवान की याद के साथ नए साल का स्वागत हो।
  • नए लक्ष्य को हासिल करने का संकल्प लें –
नए साल(New Year) में आपके हर कार्य में तरक्की हो, इसके लिए पुराने साल में जो कमियां थी। उनको सुधार कर अपने लक्ष्य पर फ़ोकस करते हुए, अपने लक्ष्य को हासिल करने का संकल्प लें। ये नया साल आपकी तरक्की लेकर आए, इसके लिए कड़ी मेहनत के साथ आगे बढ़ने का प्रण लें।
  • नए साल के अवसर पर करें मानवता भलाई के कार्य –
आप नए साल को और भी ज्यादा स्पेशल मनाने के लिए इस दिन मानवता के कार्य कर सकते हैं। जैसे कि सर्दी में कांप रहे लोगों को सर्दी के कपड़े पहनाएं, भूखों को खाना खिलाएं, पेड़ लगाएं, रक्तदान करें आदि। इस तरह मानवता के कार्यों के साथ आपका नया साल बहुत खास बनाया जा सकता है।
  • पुराने साल की नफरत को छोड़, सभी के साथ प्यार से रहने का संकल्प लें-
पुराने साल में अगर आपकी किसी के साथ दुश्मनी या झगड़ा था, तो उसे इस नव वर्ष में खत्म कर प्यार से एक नई शुरुआत करें। नफरत को भुला सभी के लिए प्यार को दिल में लेकर आएं, इस तरह से नए साल(New Year) का उत्सव मनाएं।
  • अपनी बुरी आदतों से करें तोबा और अच्छी आदतों को अपनाएं –
आपके अंदर अगर कोई बुरी आदत है, तो उसे इस नव वर्ष में छोड़ने का और अच्छी आदतों को अपनाने का प्रण करें। अच्छी आदतों से इंसान हर जगह इज्जत हासिल करता है। इसलिए इस नए साल में आप खुद को अच्छाई के राह पर अग्रसर करें।
निष्कर्ष-
तो इस तरह से आप अलग अलग और विभिन्न तरीके से इस नए साल को खास मना सकते हैं।
नया साल आप सभी के लिए खुशियों भरा हो, हम इसकी कामना करते हैं और आप सभी को नव वर्ष की बहुत-बहुत बधाई देते हैं।

क्रिसमस का त्योहार क्यों, कब और कैसे मनाया जाता है? जानिए इसको मनाने का इतिहास और इसका ईसाई धर्म के लोगों के लिए महत्व(Why, when and how is the Christmas festival celebrated? Know the history of its celebration and its importance for people of Christian religion.)-

 
त्योहारों का महत्व समाज में एकता, सामाजिक समरसता और आत्मीयता को बढ़ावा देता है। ये आपसी संबंधों को मजबूत करने, थकान और तनाव को कम करने और साँझा खुशियों को अनुभव करने का एक अवसर प्रदान करते हैं।
 
 त्योहारों की कड़ी में से क्रिसमस त्यौहार(Christmas festival) आ गया है। यह एक विशेष मौका है, जब हम परिवार और दोस्तों के साथ मिलकर आनंद और समृद्धि की भावना का आनंद ले सकते हैं।
 
ऐसे ही क्रिसमस ईसाइयों का महत्वपूर्ण पर्व है, जो ईसा मसीह के जन्म की स्मृति में मनाया जाता है। यह एक धार्मिक और सामाजिक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। लोग इसे परिवार और दोस्तों के साथ बिताने का अवसर मानते हैं।
 
क्रिसमस का त्योहार कब, क्यों और कैसे मनाया जाता है-
 
क्रिसमस एक विशेष त्योहार है, जो हर वर्ष 25 दिसंबर को मनाया जाता है। यह खासकर ईसाई धर्म के अनुयायियों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस दिन ईसा मसीह का जन्म हुआ था। इसे ‘ईसा क्रिस्त का जन्म’ के रूप में भी जाना जाता है। हालांकि यह शुरूआत में एक धार्मिक त्योहार था, लेकिन आजकल इसे धार्मिकता के अलावा भी सामाजिक और सांस्कृतिक रूप में मनाया जाता है।
 
क्रिसमस ईसाई धर्म के अनुयायियों के लिए यीशु ख्रिस्त के जन्म की स्मृति है। इस दिन को पहले रोमन साम्राज्य में सूर्य पूजा के रूप में मनाया जाता था। ईसाई धर्म में, इसे 25 दिसम्बर को मनाने का आदान-प्रदान हुआ था ताकि यह ईसाई ईसा के जन्मदिन के रूप में मनाया जा सके। मिडल एज में, क्रिसमस को लोगों के बीच मिलने का अवसर बनाने के लिए सामाजिक उत्सव के रूप में मनाने का प्रचलन बढ़ा।
 
इस दिन लोग ईसा मसीह के जन्म की सालगिरह को याद करते हैं और आपसी प्रेम और समर्पण का महत्वपूर्ण सन्देश सांझा करते हैं। क्रिसमस का आयोजन खास रूप से परिवारों और दोस्तों के साथ मिलकर होता है। लोग अपने घरों को सजाकर, क्रिसमस के ट्री को सजाकर, गानों और नृत्यों के साथ आत्मीयों के साथ खुशियाँ मनाते हैं। इस दिन बच्चे खुदा का प्यार और दया का संदेश भी सीखते हैं। क्रिसमस भंडारण और भिक्षाटन का समय भी होता है, जो समाज में सहयोग और दान की भावना को मजबूत करता है।
 
क्रिसमस के त्योहार को मानने का इतिहास और महत्व –
 
क्रिसमस(Christmas ) का आदिकालिक इतिहास चौथी सदी में आरंभ हुआ था। इसका संबंध ईसाई धर्म के ईसा मसीह के जन्म से है, जिसे 25 दिसंबर को मनाया जाता है। पौराणिक कथाएं बताती हैं कि इस दिन को उत्सवमय बनाने के लिए सूर्य की पूजा आरंभ हुई थी। यह धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव विभिन्न देशों में विविधता से मनाया जाता है और धार्मिक तथा सामाजिक आदर्शों के साथ जुड़ा हुआ है।
 
क्रिसमस, ईसाई धर्म के अनुयायियों के लिए एक महत्वपूर्ण त्योहार है। यह ईसा मसीह के जन्म की स्मृति है जो प्रेम, सदभाव और दान की भावना को बढ़ावा देता है। क्रिसमस का मतलब ‘मसीह का दिन’ है, जो मानवता के लिए आत्मा की ऊर्जा और समर्पण का प्रतीक है। इसे उत्सव और खुशी के साथ मनाने के साथ ही, लोग एक दूसरे के साथ मिलकर और साँझा करके इस अद्भुत त्योहार का आनंद लेते हैं।
 
क्रिसमस की तैयारियाँ –
 
क्रिसमस त्यौहार (Christmas festival) को मनाने की विभिन्न तैयारियाँ की जाती हैं, लेकिन सबसे प्रमुख है ईसाई धर्म के अनुयायियों के लिए यीशु क्रिस्त की जन्मगाथा। इस दिन को उनके जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है और लोग इसे धार्मिक और सामाजिक रूप से मनाते हैं। इस दिन को लोग विभिन्न सांस्कृतिक अभिवृद्धियों के साथ, परिवार और दोस्तों के साथ मिलकर, भोजन बाँटकर, गाने गाकर और उपहारों को देकर अद्वितीय रूप में मानते हैं। विशेष रूप से क्रिसमस का पौराणिक महत्व है, जो प्रेम और सहयोग की भावना को बढ़ावा देता है। इसे एक विशेष प्रकार से सजाकर, पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ मनाना एक आदर्श तरीका है।
 
क्रिसमस को मनाने के तरीके –
 
क्रिसमस मनाने के विभिन्न तरीके हैं। हर त्यौहार की सांस्कृतिक और परिवारों के आधार पर मनाने में विभिन्नता होती है।
इस त्यौहार को निम्न तरीकों से मनाया जाता है –
 
  • क्रिसमस पूजा: गृह में या परिवार के साथ मिलकर ईसाई धार्मिक रूप से पूजा करते हैं।
  • घर को सजाकर और रंग-बिरंगे लाइट्स लगाकर अच्छा माहौल तैयार किया जाता है।
  • गिफ्ट्स और उपहार देकर लोग अपने परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताते हैं।
  • खाना और मिठाई: क्रिसमस पर खाने के लिए और बांटने के लिए स्पेशल मिठाई बनाई जाती है।
  • घर में क्रिसमस कैरोल्स गाकर और उन्हें सुनकर मनोरंजन किया जाता है।
  • लोग गरीबों की सहायता करते हैं और दान करते हैं, जिससे अधिक खुशियाँ बढ़ती हैं।
  • दोस्तों और परिवारजनों के साथ मिलकर पार्टी करते हैं और साथियों के साथ हंसी-मजाक कर समय बिताते हैं।इस प्रकार हर त्यौहार हमें प्रेम और सद्भावना की शिक्षा देते हैं।
 
निष्कर्ष
 
इस त्यौहार(Christmas festival) के दिन सारा माहौल प्रेम, दया और साझेदारी का होता है। जो लोगों को एक-दूसरे के साथ और भी अधिक जोड़ता है। क्रिसमस एक आनंददायक और सामाजिक त्यौहार है, जो लोगों को मिलने, बातचीत करने और एक-दूसरे के साथ अच्छे समय बिताने का एक अच्छा मौका प्रदान करता है।

Celebrating Farmers’ Day: Honoring the Backbone of Our Nation’s Prosperity

भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहां की बहुत सी आबादी अपनी आजीविका के लिए खेती पर निर्भर करती है। देश की आजादी से लेकर आज तक किसान महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। क्योंकि हम जानते हैं कि लगभग हमारी आधी से अधिक आबादी कृषि पर ही निर्भर करती है। आज 23 दिसंबर का दिन देश भर में किसान दिवस(Farmer’s Day) के रूप बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

अन्नदाता जो मेहनत करके नई-नई फसलें उगाकर हमारा पेट भरता है। हमारे लिए वह एक मिसाल से कम नहीं है। गर्मी- सर्दी की परवाह किए बगैर खेतों में काम करके दूसरों का पेट भरने वाला अन्नदाता ही होता है, जो किसान के रूप में हमारे सामने आता है।

किसान दिवस(Farmers’ Day)

क्यों मनाया जाता है व इतिहास?

हमारे पांचवें प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह जिनका जन्म 23 दिसंबर 1902 को हुआ था, जोकि किसानों के मसीहा थे। इसलिए 2001 से लेकर आज तक प्रत्येक वर्ष चौधरी चरण सिंह को सम्मानित करने के लिए 23 दिसंबर को उनके जन्मदिन के उपलक्ष्य में इस दिन को किसान दिवस (Farmer’s Day)के रूप में मनाया जाता है। क्योंकि चौधरी चरण सिंह ने कृषि क्षेत्र के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

महत्व-

देश की आबादी का अधिकतम हिस्सा गांवों की भूमि पर बसने के कारण देश की अधिकांश आबादी कृषि द्वारा संचित आय पर निर्भर करती है। प्रत्येक फ़सल के पीछे किसान की मेहनत और लगन होती है। किसानों को अधिकतम जानकर व सशक्त बनाने के लिए चर्चा, विचार और विमर्श भी की जाती है।

राष्ट्रीय किसान दिवस(Farmer’s Day) का उद्देश्य-

राष्ट्रीय किसान दिवस(Farmer’s Day) मनाने का उद्देश्य किसानों को सशक्त बनाने के लिए और कई तरह के सेमिनारों का आयोजन करके चौधरी चरण सिंह जी याद में इस दिन को मनाया जाना है‌।

किसान दिवस कैसे मनाया जाता है-

इस दिन किसानों के लिए कई तरह के सेमिनारों का आयोजन किया जाता है, जिसमें उनको खेती करने के नए तरीके बताए जाते हैं और अन्य बीमा योजनाओं के बारे में जानकारी दी जाती है। इस दिन सरकार किसानों के उज्जवल भविष्य के लिए नई नीतियों की घोषणा करती है।

पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के विचार थे कि सच्चा भारत, किसानों और कृषि के रूप में गांवों में बसता है। जब किसान की दशा सुधरेगी तभी हमारा देश सुधरेगा। धैर्य रखें! आने वाले समय में दूध से ही घास बन सकती है। तब तक देश प्रगति नहीं कर सकेगा, जब तक किसानों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होगी।

निष्कर्ष-

आजादी के बाद से किसानों की स्थिति हेतु कई तरह के सुधार करने के प्रयास किये गए हैं। जैसे की सब्सिडी पर खाद व अन्य सुविधाएं उपलब्ध करवाना। परन्तु किसानों की दशा दयादीन ही है, क्योंकि कुछ बड़े किसान ही इसका फायदा उठा सकते हैं।क्योंकि 85% किसानों के पास केवल दो हेक्टेयर से कम भूमि होने के कारण बहुत से लोग इसका फायदा नहीं उठा सकते हैं।इसलिए कृषकों के विकास हेतु जो भी कदम उठाए गए वह 85% किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए दिए जाएं जिसका लाभ हर वर्ग का व्यक्ति उठा सकें। आख़िर में सभी को किसान दिवस(Farmer’s Day) की हार्दिक शुभकामनाएँ।

वजन कम करने में रामबाण है मीठी तुलसी (Stevia)-

आज के समय में बढ़ता वजन और मोटापा हर दूसरे से तीसरे इंसान के लिए एक बहुत बड़ी समस्या है। हर इंसान चाहता है कि वह स्वस्थ रहे। लेकिन बढ़ते वजन/मोटापे के कारण शरीर बीमारियों का घर बन जाता है।
वजन बढ़ने से इंसान को बहुत सी बीमारियां आकर घेरती है।

वजन बढ़ना तो आसान है लेकिन इसे कम करना बहुत ही मुश्किल है। लेकिन एक तरीका है जिससे इंसान अपना वजन कम कर सकता है।
“मीठी तुलसी” जिसे Stevia भी कहते हैं। इसका सेवन करने से बढ़ता वजन ही कम नहीं होता बल्कि और भी बहुत सी बीमारियों में राहत मिलती है।

आखिर क्या है मीठी तुलसी (Stevia)-

‘Stevia’ यानी मीठी तुलसी, सूरजमुखी परिवार (एस्टरेसिया) के झाड़ी और जड़ी बूटी के लगभग 240 प्रजातियों में पाया जाने वाला एक जीन्स है। यह पश्चिमी उत्तर अमेरिका से लेकर दक्षिण अमेरिका के उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है। यह तालाबों अथवा नालों के किनारों पर प्राकृतिक रूप से उगता है।

यह जीरो कैलोरी वाला पौधा सैकड़ों वर्षों से नेचुरल शूगर के ऑप्शन और स्वाद बढ़ाने वाले घटक के रूप में उपयोग किया जाता है। जो लोग बढ़ते वजन या मोटापे के कारण मीठे का सेवन नहीं कर सकते, वो इस मीठी तुसली के सेवन से अपना मीठे का शोंख पूरा कर सकते हैं।

Stevia/मीठी तुसली के अन्य फायदे –

मीठी तुलसी यानी Stevia में केवल बढ़ते वजन को कम करने का ही गुण नहीं पाया जाता बल्कि यह और भी अन्य समस्याओं में राहत प्रदान करती है ।
मीठी तुलसी में शुगर नहीं होता अर्थात इसमें कैलोरी की मात्रा जीरो होती है।
इसलिए यह वजन कम करने में रामबाण का काम करती है। मीठी तुलसी वजन कम करने के अलावा और भी अन्य बीमारियों में फायदेमंद है।

बढ़ते शुगर लेवल को करती है कंट्रोल –

मीठी तुलसी में औषधीय गुणों से भरपूर है। इसमें मौजूद नॉन ग्लाइसेमिक स्वीटनर बढ़ते शुगर को नियंत्रित करने में मददगार है।

इसका सेवन करने से ब्लड शुगर और इन्सुलिन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसलिए अगर आप शुगर के मरीज हैं और मीठा खाने के चाहवान हैं, तो आप मीठी तुलसी का सेवन कर सकते है।

मीठी तुलसी बढ़ते रक्तचाप को नियंत्रित में सहायक-

ब्लड प्रेशर आज आम समस्या बनी हुई है। मीठी तुलसी के इस्तेमाल से बढ़ते रक्तचाप को भी नियंत्रित किया जा सकता है।
मीठी तुलसी के रस में विद्यमान ग्लाइकोसाइड रक्त वाहिकाओं को चौड़ा करने की ताकत रखते हैं। जो सोडियम उत्पादन और उत्तर उत्सर्जन को भी बढ़ा देते हैं।

एक अध्ययन के अनुसार मीठी तुलसी (Stevia) के पौधे में विद्यमान कार्डियोटोनिक क्रियाएं बढ़ते रक्तचाप को कम करते हुए दिल की धड़कन को नियंत्रित करने में सहायक है।
इस तरह से आप मीठी तुलसी के सेवन से अपने बढ़ते वजन और मोटापे को कम करने के साथ अन्य समस्याओं से भी निजात पा सकते हैं।

निष्कर्ष-

जहां मीठी तुलसी बहुत सी समस्याओं से छुटकारा दिलाने में मददगार है, वहीं इसका ज्यादा मात्रा सेवन शरीर के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है। यह किडनी, प्रजनन हृदय प्रणाली को नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए मीठी तुलसी/Stevia का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह अनुसार ही करें।

Winter Destinations- सर्दियों में घूमने की कर रहे हैं प्लानिंग, तो यह जगह है सबसे अच्छी

घूमना-फिरना हर इन्सान को अच्छा लगता है। सर्दी का मौसम शुरू हो चुका है। उत्तर भारत में अब मौसम बहुत रफ्तार से बदल रहा है।

सर्दी का मौसम हर इंसान को बहुत पसंद आता है। क्योंकि इस मौसम में घूमने-फिरने और खाने-पीने का एक अपना अलग ही मजा होता है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें, भारत में बहुत सी ऐसी जगह हैं, जहां सर्दियों में घूमने का अलग ही मजा है। कईं जगहों पर इस मौसम में बर्फबारी शुरू हो जाती है।

सर्दियों में छुट्टियों में अगर आप कहीं घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो एक बार इन जगहों पर जरूर जाएं। ये जगह सुकून और शांति से भरपूर हैं, जहां आप एक बार जाकर हर बार जाना पसंद करेंगे।

भारत में घूमने की सबसे अच्छी जगह-

  1. केरल
  2. गोवा
  3. राजस्थान
  4. हिमाचल के सबसे लोकप्रिय स्थल
    शिमला, मनाली और धर्मशाला।

 

1.केरल-

केरल दक्षिण भारत में बसा वो राज्य है जो बीच और बाँधों के लिए मशहूर है। इसे “ईश्वर का अपना घर” के नाम से भी जाना जाता है। यहां विभिन्न प्रकार की चाय और कॉफी की चुस्कियाँ लेते-लेते आपका मन नहीं भरेगा।
बारिश के बाद केरल की हरियाली का अपना ही अलग रंग होता है। यहां खड़े मसालों की सौंधी खुशबू आपको रसोई के नटखट और चटपटे स्वाद का स्मरण करवाएगा। केरल के दर्शनीय स्थल आपके इन सभी एहसासों को जीवंत कर देंगा।

केरल में प्रकृति से प्यार करने वालों के लिए सुंदर पहाड़ी स्टेशन, महासागर प्रेमियों के लिए सुनहरे सुंदर तट, पशु प्रेमियों के लिए विदेशी वन्यजीवन, शरीर और दिमाग को शांत करने के लिए आयुर्वेदिक मालिश और योग सब का अपना-अपना अलग महत्व है।

केरल में घूमने के लिए यादगार स्थल –

नाव की सवारी करने वालों के लिए अलापुला, थेककाड़ी और वेम्बानाद बहुत ही शानदार स्थल है।
वन्यजीव प्रेमियों के लिए साइलेंट वैली नेशनल पार्क, पेरियार टाइगर रिजर्व और कुमारकाम पक्षी अभ्यारण्य बहुत अच्छी जगह है। पक्षी प्रेमियों के लिए कन्नूर और कोझिकोड जिलों में स्थित वायनाड स्थल। धार्मिक स्थल में श्री पद्मनाभास्वामी मंदिर ज़ो की भगवान विष्णु की कलाकारी का प्रसिद्ध मंदिर है।

2. गोवा –

शीतकालीन मौसम में घूमने के लिए गोवा बहुत ही सुंदर और प्राकृतिक नज़ारों से भरा रमणीक स्थल है।
वैसे तो यहां किसी भी मौसम में जा सकते हैं। लेकिन सर्दी के मौसम में गोवा में घूमने का अलग ही नजारा है।
नए साल का जश्न मनाने के लिए गोवा सबसे बढ़िया स्थान है।
गोवा को भारत की पार्टी राजधानी भी कहा जाता है। यहां के रोमांचित सुनहरे समुद्र तट रोमांचक जल खेल, पारिवारिक व्यंजन, पुर्तगाली संस्कृति और जीवंत त्यौहार इस स्थान गोवा को भारत का सबसे बढ़िया सर्दियों में घूमने का अवकाश स्थल बनाते हैं।

यहां के समुद्री तट, आकर्षक चर्च, मंदिर, पुराने किले, लहराते पेड़, कार्निवल मांडवी नदी के तट पर क्रुज की सवारी आदि पर्यटकों के लिए सबसे आकर्षण का केंद्र है।
आपको बता दें कि दिसंबर में घूमने की सबसे अच्छी जगह गोवा है। अतः अगर आप भी अब की बार कहीं घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो इस बार गोवा जरूर जाएं।

3. राजस्थान –

राजस्थान भारत के पश्चिम में स्थित है। राजस्थान ना केवल अपनी संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहां के प्राचीन महल, किले, परंपरा, वेश भूषा, राजशाही इतिहास सब पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं।

हालांकि राजस्थान में ज्यादा ठंड नहीं होती, लेकिन सर्दी के मौसम में यहां घूमने का नजारा बेहद खूबसूरत होता है।
यहां के प्राचीन किले, “गढ़” के नाम से बहुत प्रसिद्ध है।
राजस्थान के महाराजाओं की संस्कृति और परंपरा को उनके चमकदार किलों व राजसी कलाकारियों में साफ-साफ देखा जा सकता है।

राजस्थान में घूमने के प्रसिद्ध स्थल व स्थान-
जोधपुर, रणथंबोर, जैसलमेर, उदयपुर, बीकानेर और माउंट आबू आदि राजस्थान में घूमने के बहुत ही सुंदर स्थान हैं।

पुष्कर और अजमेर तीर्थ अद्भुत तीर्थ स्थान है।
इन स्थानों पर आकर आप खुद को भगवान के शरण में आया महसूस कर सकते हैं। यहाँ आप अपने को बहुत ही शान्त महसूस करेंगे।
बीकानेर और बूंदी राजस्थान की विरासत और राजशाही से भरे शहर हैं।
शाही महल और गजनेर पैलेस बीकानेर का प्रसिद्ध यात्रा स्थल है।
जोधपुर वास्तुकार प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र है।
जैसलमेर मिठाई सीहोर और ऊंट की सवारी के लिए प्रसिद्ध स्थल है।

इस प्रकार राजस्थान की विभिन्न जगहों की कला और लोक नृत्य काफी मनोहर है। यह इंसान के दिलो दिमाग में एक जादू सा कर देते हैं। सर्दियों के मौसम में राजस्थान में घूमने का एक अपना ही आनंद है।

4. हिमाचल के सबसे लोकप्रिय स्थल शिमला, मनाली और धर्मशाला –
सर्दियों में अगर आप हिमाचल में घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो आप शिमला, मनाली या धर्मशाला जरूर जाएं।
सर्दियों में सैलानियों के लिए हिमाचल की राजधानी “शिमला” बर्फबारी का आनंद लेने के लिए बहुत ही परफेक्ट और सुंदर स्थान है।

शिमला घुमावदार पहाड़ियों और बर्फ से ढके जंगलों से घिरा हुआ बहुत ही सुंदर पर्यटक स्थल है। शिमला साइक्लिंग करने के लिए बहुत अच्छा स्थान है।

मनाली- मनाली हिमाचल में बर्फबारी से घिरा बहुत रमणीक स्थल है। यहां आकर हर कोई अपने आपको स्वर्ग से घिरा पाता है। यहां के पेड़ और देवदार के पेड़ प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर हैं जो पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
मनाली को रंग-बिरंगे फूलों की घाटी कहा जाता है। बर्फ के कारण सर्दियों में यहां हरियाली दूर-दूर तक नजर नहीं आती।

एडवेंचर के शौकीन के लिए मनाली-ट्रैकिंग, स्कीइंग, पैरा ग्लाइडिंग आदि के लिए बहुत अच्छा स्थल है।
मनाली स्कीइंग अभियान, नदी बीस, पर्वतारोहण, अन्य साहसिक खेल और हिमालय के शानदार दृश्य के लिए बहुत प्रसिद्ध है।

धर्मशाला- अगर आप इस बार सर्दियों में किसी शांत स्थल पर घूमने का सोच रहे हैं तो धर्मशाला घूमने के लिए पहाड़ों से घिरा बहुत ही रमणीक और शांत स्थल है।
धर्मशाला को दलाई लामा के “गृहनगर” के नाम से भी जाना जाता है।
बर्फ से ढके हुए पहाड़ों, शांतिपूर्ण मठ, शांत झीलों और चुनौती पूर्ण ट्रैकिंग ट्रेल्स से घिरा धर्मशाला ऐसा स्थल है, जहां अभी तक व्यवसायीकरण अनछुआ है।
यह बहुत ही शांत स्थल है।

अगर आप भी इस बार सर्दियों में कहीं घूमने का सोच रहे हैं तो आप इन रमणीक स्थलों पर जरूर जाएं और प्रकृति का भरपूर आनंद लें।

Cricket World Cup 2023: Did India lose the World Cup because of the Law of averages?

Cricket World Cup 2023: वर्ल्ड कप के फाइनल मुकाबले में भारतीय टीम(Indian team) जैसे ही ऑस्ट्रेलिया टीम से हारी, वहाँ पर उपस्थित तमाम क्रिकेट एक्सपर्ट्स और सांख्यिकीविद् (Statistician) इसके लिए Law of Average को जिम्मेदार ठहराने लगे। जब टीम इंडिया लीग मैच के आखिरी पड़ाव पर थी, तब भी कुछ एक्सपर्ट्स का कहना था कि बेहतर होता कि नॉक आउट में पहुँचने से पहले भारतीय टीम एक या दो लीग में हार जाती।

विश्व कप में टीम इंडिया के हारने का क्या है असली कारण? क्या लॉ ऑफ एवरेज है इसका असल कारण? जानिए टीम इंडिया के हारने की क्या है असली कहानी?

ICC विश्व कप का आयोजन कब, कहां किसके बीच-

ICC विश्व कप का मैच 5 अक्टूबर को शुरू हुआ था और गत 19 नवंबर को इसका फाइनल मैच हुआ। यह मैच भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुआ। जिसमें ऑस्ट्रेलिया टीम ने मैच में जीत हासिल की।

इस बार विश्व कप में 10 टीमों ने भाग लिया। अबकी बार क्रिकेट इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ की पूरे क्रिकेट विश्व कप का आयोजन भारत में हुआ। यह मैच अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में हुआ।

विश्व कप में भारत की सेमी फाइनल में जीत –

भारत ने सेमी फाइनल में अपनी जगह बनाने के लिए 10 मैच लगातार जीते। सेमी फाइनल में भारत ने न्यूजीलैंड को हराकर अपनी जगह निश्चित की। अब सभी भारतवासियों की उम्मीद भारत को फाइनल विश्व कप में जीतता हुआ देखने की थी। लेकिन ऑस्ट्रेलिया ने फाइनल मुकाबले में शानदार जीत हासिल की।

भारत के फाइनल मुक़ाबले में हारने के कईं कारण सामने रख रहे हैं। कुछ का मानना है कि भारत लॉ ऑफ एवरेज के कारण ये मैच हार गया है। लेकिन असली कारण आखिर क्या है जिससे भारत इस बार विश्व कप में जीत हासिल नहीं कर पाया?

क्या है लॉ ऑफ एवरेज का नियम –

कुछ क्रिकेट एक्सपर्ट्स के मुताबिक़ फाइनल विश्व कप में भारत की हार का कारण लॉ ऑफ एवरेज यानी “ओसत का नियम ” बताया जा रहा है।

आखिर ये नियम क्या है ?

क्रिकेट एक्सपर्ट्स के अनुसार कोई भी टीम लगातार जीत हासिल नहीं कर सकती। भारत लगातार 10 मैच जीत चुका था। तो इस लॉ ऑफ एवरेज नियम के अनुसार संखियिकीविदों का मानना था कि देर सवेर भारत को हराना ही था। क्या भारत की हार का ये असली कारण है ? अगर ऐसा है तो ऑस्ट्रेलिया टीम भी लगातार 11 मैच जीतकर फाइनल में शामिल हुई है।

यह केवल एक अवधारणा है। इसका भारत की हार से कोई लेना देना नहीं है। भारत की विश्व कप में हार का असल कारण कुछ और ही है।